बलात्कार – रो रो माँ का हाल बुरा था छाती पीट-पीट चिल्लाये

जब जब मै स्कूल चली
तोते सा फिर माँ ने मुझको
रोज सिखाया – रोज पढाया
क्षुद्र जीव हैं इस समाज में
भोली सूरति उनकी
प्यार से कोई पुचकारेंगे
कोई लालच देंगे तुझको
कोई चन्दन कही लगाये
तिलक लगाये भी होंगे
बूढ़ा या फिर जवां कही !
आँखें देख सजग हो जाना
भाषा दृग की समझ अभी !!
मतलब से बस मतलब रखना
अगर जरुरी कुछ – बस कहना !
मौन भला- गूंगी ही रहना !!
बेटी – देखा- ही ना होता !
मन में- काला तम -भी होता !!
“नाग” सा जो “कुंडली” लपेटे
“डंस” जाने को आतुर होता !!
ये सब गढ़ी पुरानी बातें
इस युग में मुझको थी लगती
टूट चुकी हूँ उस दिन से मै
माँ के अपने चरण में गिरती !!
अंकल-दोस्त – बनाती सब को
मेरी सहेली एक विचरती
सदा फूल सी खिलती घूमी
सब से उसने प्यार किया
शाम सवेरे बिन डर भय के
आँखों को दो चार किया !!
प्रेम – प्रेम -में अंतर कितना
घृणा कहाँ से आती !
माँ की अपनी बातें उसको
मै रहती समझाती !!
खिल्ली मेरी उड़ाती रहती
जरा नहीं चिंतन करती
उस दिन गयी प्रशिक्षण को जब
शाम थी फिर गहराई
माँ बाबा मछली सा तडपे
नैन से सारा आंसू सूखा
बात समझ न आई !!
कुछ अपनों को गृह में ला के
रोते घूमे सारी रात !
ना रिश्ते में ना नाते में
खोज खोज वे गए थे हार !!
काला मुह अपना ना होए
कुछ भी समझ न आये !
कभी होश में बकते जाते
बेहोशी भी छाये !!
दिन निकला फिर बात खुल गयी
पुलिस- लोग -सब -आये
ढूंढ ढूंढ फिर “नग्न” खेत में
क्षत – विक्षत -बेटी को पाए

(photo with thanx frm google)
खून बहा था गला कसा था

आँखें शर्मसार हो जाएँ !
“कुत्तों” ने था छोड़ा उसको
“कुत्ते” पास में कुछ थे आये !!
रो रो माँ का हाल बुरा था
छाती पीट पीट चिल्लाये
देख देख ये हाल जहाँ का
छाती सब की फट फट जाये


(photos from net/google with thanx)

पल में चूर सपन थे सारे !
पढना लिखना उड़ना जग में
चिड़ियों सा वो मुक्त घूमना
लिए कटोरी दूध बताशा
माँ दौड़ी दौड़ी थक जाये !!
बचपन दृश्य घूम जाता सब
लक्ष्मी –दुर्गा- चंडी -झूंठे
आँखे फटी फटी पत्थर सी
पत्थर की मूरति झूंठलाये !!
कितने पापी लोग धरा पर
जाने क्यों जग जनम लिए
मर जाते वे पैदा होते
माँ उनकी तब ही रो लेती
रोती आज भी होगी वो तो
क्या उनसे सुख पाए ???
उसका भी काला मुँह होगा
जो बेटा वो अधम नीच सा
बलात्कार में पकड़ा जाए !
दोनों माँ ही रोती घूमें
रीति समझ ना आये !!
पकड़ो इनको बाँधो इनको
कोर्ट कचहरी मत भेजो
मुह इनका काला करके सब
मारो पत्थर- गधे चढ़ाये –
जूता चप्पल हार पिन्हाये
मूड मुड़ाये – नोच नोच
कुछ “उस” बच्ची सा लहू निकालो !
लौट के फिर भाई मेरे सब
इनकी नाक वहीँ रगडा दो !!
आधा इनको गाड़ वहीँ पर
उन कुत्तो को वहीँ बुला लो
वे थोडा फिर रक्त चाट लें
इस का रक्त भी इसे पिला दो !!
क्या क्या सपने देख गया मै
दिवा स्वप्न सब सारे
पागल बौराया जालिम मै
ऐसी बातें मत सोचो तुम
जिन्दा जो रहना है तुम को !
दफ़न करो ना कब्र उघारो !!
वही कहानी लिखा पढ़ी फिर
पञ्च बुलाये कफ़न डाल दो
गंगा जमुना ले चल कर फिर
उनको अपनी रीति दिखा दो !!
हिम्मत हो तो कोर्ट कचहरी
अपना मुह काला करवाओ
दौड़ दौड़ जब थक जाओ तो
क्षमा मांग फिर हाथ मिलाओ !!
नहीं तंत्र सब घेरे तुझको
खाना भी ना खाने देगा !
जीना तो है दूर रे भाई
मरने भी ना तुझको देगा !!
कर बलात जो जाये कुछ भी
बलात्कार कहलाये ???
वे मूरख है या पागल हैं
नाली के कीड़े हैं क्या वे ?
मैला ही बस उनको भाए !
नीच अधम या कुत्ते ही हैं
बोटी नोच नोच खुश होयें !!
इनके प्रति भी मानवता
का जो सन्देश पढाये
रहें लचीले ढीले ढाले
कुर्सी पकडे -धर्म गुरु या
अपने कोई -उनको -अब बुलवाओ
वे भी देखें इनका चेहरा
उडती चिड़िया कटा हुआ पर

रक्त बहा वो -चीख यहाँ की
तब गूंगे हो जाएँ !!!
शुक्ल भ्रमर ५
२३.०५.२०११ जल पी बी

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छवि ‘माँ’ की धूमिल करते जो -‘पाप’ कर रहे सौ-सौ

छवि ‘माँ’ की धूमिल करते जो -‘पाप’ कर रहे सौ-सौ


( फोटो साभार और धन्यवाद के साथ अन्य स्रोत से लिया गया )

ओ ‘माटी’ के ‘लाल’ हमारे
‘शक्ति’ रूपिणी ‘नारी’
आओ ‘हाथ’ बढाओ अपना
‘चीख’ सुनो हे भाई
‘माँ’ ने तुम्हे पुकारा है अब
‘रखवाले’ सब आओ
छवि ‘माँ’ की धूमिल करते जो
‘पाप’ कर रहे सौ-सौ
कोई नोच -खसोट रहा है
‘महल’ बनाये नौ -सौ
कहीं एक ‘भूखा’ मरता है
‘बिन व्याही’- ‘बेटी’ बैठी
फटी -धरा है
बीज -नहीं है
मरा ‘कृषक’ ले ‘कर्ज’ कहीं है
‘विधवा’ घर ‘रोती’ बैठी
भरा हुआ धन देश हमारे
‘सोने की चिड़िया’ हम अब भी
आओ करें ‘शिकार’ उसी का
जो ‘चिड़िया की घात’ में बैठा
बीच हमारे
‘जाल’ बिछाए
‘दाना डाले’
‘फंसा’ रहा है
‘कैद’ में कर के
‘गला दबा’ के
‘डरा’ रहा है
‘उड़ा’ जा रहा -उस ‘सागर के पार’ !! आओ उसको हम दिखला दें
‘ताकत’ अपनी –‘माँ’ की भक्ति
बड़े हमारे ‘लम्बे हाथ’ !
हम ‘शक्ति’ हैं !
‘काली’ भी हम !
गला काटकर
मुंड-माल ले -पहने चाहें !!
‘भैरव’ भी हम
‘रौद्र रूप’ हम धारण करके
‘तांडव’ भी करना जानें
अगर तीसरा- नेत्र
हमारा-शिव हो -शिव हो
‘शिव’ की खातिर
खुला तो कांपेगी -धरती फिर
काँप उठे सारा संसार !!

अगर ‘प्रलय’ ना अब भी चाहो
तो ‘धारा’ के साथ बढ़ो
चूम गगन -फहरा दो ‘झंडा’
आज ‘तिरंगा’
दूषित ‘मन’ का दहन करो !!!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भरमार ५
८.४.२०११
aaiye Anna Ji ke Abhiyan me Haath badhayen ….

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सच की तू तावीज बंधा दे – दादी माँ मै सोना चाहूं

सच की तावीज
दादी माँ मै सोना चाहूं
दे-ना चाहे तो लोरी गाये
मुझे सुला दे !!
दुल्हन दे -या -चाँद खिलौना
थाली में परछाईं या फिर
तारों की बारात दिखा दे
दूध दही टानिक मन चाहे
मुस्काए तो दादी अम्मा
चूने का ही घोल पिला दे
रंग -बिरंगे परिधानों से सज-
गाडी चढ़
कान्वेंट स्कूल भिजा दे
मन क्यों बोझिल??
कागज़ दे लकड़ी के टुकड़े –
प्राईमरी पैदल पहुंचा दे
हवा चले भी कुछ टूटे ना
मुस्काए वे घूम रहे हैं
नम क्यों आँखें -पट्टी बाँधे
चलूँगा मै भी बोझ उठाये
चलें वे उड़कर वर्दी सजकर –
मेवे खाएं !!
पेट तुम्हारा मै भी भरकर
सर आँखों में तुझे बिठाकर –
चलूँ उठाये !!
महल उठाये नाम कमाए
‘धन’-‘ लालच’ कुछ शीश झुकाए
रोशन तेरा नाम करूँगा -“कुटिया ” में
दुनिया खिंच आये
गर्व भरे तू शीश उठाये !!
‘दादी’ –‘माँ’ -सपने ना मुझको
सच की तू तावीज बंधा दे
हंसती रह तू दादी अम्मा
आँचल सर पर मेरे डाले
मार पीट कर उसे गिराकर
‘पहलवान’ जो ना बन पाऊँ
दे ऐसा ‘आशीष’ मुझे माँ
‘आँखों का तारा’ बन जाऊं

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
२०.०८.१९९४( लेखन हजारीबाग-झारखण्ड )

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पावन पर्व नवरात्रि – आओ हम ‘बुराइयों’ पर अच्छाइयों की ‘विजय’ करें

पावन पर्व नवरात्रि – आओ हम ‘बुराइयों’ पर अच्छाइयों की ‘विजय’ करें

आज हमारा पावन पर्व नवरात्रि आरम्भ हो रहा है और हम अतीत से ये मानते रहे हैं की माँ जगद जननी हमारे बीच अपने नौ स्वरुप लेकर विराजमान रहेंगी ये बड़े गर्व की बात है की आज भी हमारी नारियां व् पुरुष इनकी आराधना में तत्पर रहते हैं विशेषकर हमारी महिला वर्ग इस और बहुत जागरूक है और उनकी पूजा अर्चन हेतु सुबह से ही जुट गयी हैं उनकी कलश स्थापना करना उनका पाठ करना अब दिन चर्या का मुख्य अंग बना रहेगा नौ दिन -हर काम से पहले इसकी प्राथमिकता देना माँ दुर्गा के हर रूप को दिन प्रतिदिन याद कर अपने को पवित्र बनाना और बुराइयों पर अच्छाइयों को उजागर करना बुराइयों का दमन करना इन दिनों में विशेष स्थान पाता है हमारे मंदिरों में माँ के दर्शन हेतु लम्बी लाईन अब लगी रहेंगी चाहे वो किसी भी माँ का पवित्र मंदिर हो जैसे माँ वैष्णवी हों , माँ विन्ध्याचल हों , माँ काली कलकत्ते काली घाट में विराजमान हों या हमारे घर गाँव से जुडी अधिष्ठात्री देवी कोई भी मंदिर इन दिनों जगमगाता रहेगा
आइये हम भी माँ के इन नौ स्वरूपों का कुछ ध्यान कर लें उनका नाम कम से कम अपने अन्तरंग में बसा लें ,अपनी संस्कृति को आत्मसात कर लें ,

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